शिवलिंग
Shiv Ling Haqeeqat me Shiv ji ka ling ( private part) hai
Main Do prees ki kitab ka screen shot de raha hun ap khud pad le ( book reference ke sath )
Geeta press Gorakhpur ka bhi reference of Tarjuma hai
- (शिव ० कोटिरुद्रसंहिता ४ अध्याय १२ शलोक 06 से 48)
- भाषार्थ- दारु नाम का एक वन था , वहाँ पर सत्पुरुष लोग रहते थे , जो शिव के भक्त थे तथा नित्यप्रति शिव का ध्यान किया करते थे ॥ ६ ॥ वे कभी लकड़ियाँ चुनने के लिए वन को गये । वे सब के सब श्रेष्ठ ब्राह्मण शिव के भक्त , तथा शिव का ध्यान करनेवाले थे ॥ ८॥ इतने - में साक्षात् महादेवजी विकट रूप धारण कर उनकी परीक्षा के निमित्त आ पहुँचे ॥ ९ ॥ नंगे , अति तेजस्वी , विभूतिभूषण से शोभायमान , कामियों के समान दुष्ट चेष्टा करते हुए , हाथ में लिंग धारण करके ॥ १० ॥ मन से उन वनवासियों का भला करने के लिए भक्तों पर प्रसन्न होकर शिवजी स्वयं प्रीति से उस वन में गये ॥ ११ ॥ उसको देखकर ऋषियों की पत्रियाँ अत्यन्त भयभीत हो गई , व्याकुल तथा हैरान हुई , कई वापस आ गईं ॥ १२॥ कई आलिंगन करने लगीं , कई ने हाथ में धारण कर लिया तथा परस्पर के संघर्ष में वे स्त्रियाँ मग्न हो गई ॥ १३ ॥ इतने में ही ऋषि महात्मा आ गये इस प्रकार के विरुद्ध काम को देखकर वे दुःखी हो क्रोध से मूर्च्छित हो गये ॥ १४ ॥ तब दुःख को प्राप्त हुए वे कहने लगे- ये कौन है , ये कौन है ? वे सब के सब ऋषि शिव की माया से मोहित हो गये ॥ १५ ॥ जब उस नंगे अवधूत ने कुछ भी उत्तर न दिया , तब वे परम ऋषि उस भयंकर पुरुष को यों कहने लगे ॥ १६॥ तुम जो यह वेद के मार्ग को लोप करनेवाला विरुद्ध काम करते हो , इसलिए तुम्हारा यह लिंग पृथिवी पर गिर पड़े ॥ १७ ॥ उनके इस प्रकार कहने पर उस अद्भुत रूपधारी , अवधूत शिव का लिंग उसी समय गिर पड़ा ॥ १८ ॥ उस लिंग ने सब कुछ जो आगे आया अग्नि की भाँति जला दिया । जहाँ जहाँ वह जाता था वहाँ वहाँ सब कुछ जला देता था ॥ १ ९ ॥ वह पाताल में भी गया , वह स्वर्ग में भी गया , वह भूमि में सब जगह गया , किन्तु वह कहीं भी स्थिर नहीं हुआ ॥ २० ॥ सारे लोक लोकान्तर व्याकुल हो गये तथा वे ऋषि अति दुःखित हुए ॥ २१ ॥ वे दुःखी हुए सब मिलकर ब्रह्मा के पास गये ॥ २२ ॥ तब ब्रह्मा उन ऋषियों को स्वयं कहने लगे ॥ ३१ ॥ हे देवताओ । पार्वती की आराधना करके शिव की प्रार्थना करो , यदि पार्वती योनिरूप हो जावे तो वह लिंग स्थिरता को प्राप्त हो जावेगा ॥ ३२ ॥ जब उन ऋषियों ने परमभक्ति से शंकर की प्रार्थना और पूजा की , तब अति प्रसन्न होकर महादेवजी उनसे बोले ॥४४ ॥ हे देवता और ऋषि लोगो ! आप सब मेरी बात को आदर से सुनें यदि मेरा लिंग योनिरूप से धारण किया जावे तब शान्ति हो सकती है ॥ ४५ ॥ मेरे लिंग को पार्वती के बिना और कोई धारण नहीं कर सकता । उससे धारण किया हुआ मेरा लिंग शीघ्र ही शान्ति को प्राप्त हो जावेगा ॥४६ ॥ पार्वती तथा शिव को प्रसन्न करके और पूर्वोक्त विधि के अनुसार वह उत्तम - लिंग स्थापित किया गया ॥ ४८ ॥
Main Usse me koi Raay nhi duga na Tabir karo ga ap khud pad kar Samj Jao 😑
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